Maa Shakumbhari Devi History

जानिए सांभर और सहारनपुर मंदिर का असली इतिहास

आदिशक्ति का ही एक पावन रूप मां शाकुंभरी देवी हैं।। वैसे तो पूरे भारत में माता के कई पवित्र धाम हैं, लेकिन राजस्थान के सांभर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर (बेहट) का इतिहास आपस में गहरे से जुड़ा हुआ है। चौहान वंश की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली माता का यह इतिहास बेहद चमत्कारी और रोचक है।

चौहान वंश की कुलदेवी और सांभर का सबसे पुराना मंदिर

मां शाकुंभरी देवी का सबसे प्राचीन और मूल मंदिर राजस्थान के सांभर में स्थित है। माता शाकुंभरी को चौहान राजपूतों की कुलदेवी माना जाता है।
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, चौहान वंश के राजाओं के समय इस क्षेत्र में भयानक अकाल पड़ा था। तब माता ने कृपा करके यहां शाक और वनस्पतियां प्रकट की थीं, जिससे इनका नाम ‘शाकुंभरी’ पड़ा। बाद में माता ने इस पूरे इलाके को सोने-चांदी के मैदान में बदल दिया था। लेकिन लोगों का लालच बढ़ने पर, माता ने उस सोने के मैदान को नमक की झील में बदल दिया, जिसे आज हम सांभर झील (Sambhar Lake) के नाम से जानते हैं। चौहान शासकों के लिए माता हमेशा से उनकी सबसे बड़ी रक्षक रही हैं।

राजस्थान से सहारनपुर कैसे आई माता की ज्योत? जस्मौर रियासत की कहानी

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के बेहट इलाके में स्थित शाकुंभरी देवी मंदिर का इतिहास डायरेक्ट राजस्थान से जुड़ा है। सांभर वाला मंदिर सबसे पुराना है, जबकि सहारनपुर में माता की स्थापना बाद में हुई थी।
सहारनपुर के बेहट के पास पड़ने वाली जस्मौर रियासत के राजा माता शाकुंभरी के बहुत बड़े भक्त थे। वह हर साल माता के दर्शन के लिए राजस्थान के सांभर जाया करते थे। एक बार जब राजा वहां पूजा कर रहे थे, तो उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें आदेश दिया। माता के आदेश के अनुसार, जस्मौर रियासत के राजा वहां से माता की अखंड ज्योत लेकर सहारनपुर के बेहट इलाके में आए। उन्होंने शिवालिक की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच, जहां आज मंदिर स्थित है, वहां उस पवित्र ज्योत को स्थापित किया और मंदिर का निर्माण करवाया। इस तरह राजस्थान के चौहानों की कुलदेवी, यूपी के सहारनपुर के जस्मौर में आकर विराजमान हुईं।

सहारनपुर शाकुंभरी देवी: बाबा भूरादेव का नियम

सहारनपुर सिद्धपीठ की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां माता के दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाते, जब तक आप बाबा भूरादेव के दर्शन नहीं कर लेते। भूरादेव माता के अनन्य भक्त थे, जिन्होंने राक्षसों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। माता ने उन्हें वरदान दिया था कि जो भी भक्त मेरे दर्शन के लिए आएगा, उसे पहले तुम्हारी पूजा करनी होगी। इसलिए आज भी सभी भक्त पहले भूरादेव के दर्शन करते हैं, फिर माता के दरबार में जाते हैं।

​योगी सरकार में बदल रही है मां शाकुंभरी धाम की सूरत

​उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इस समय सहारनपुर के मां शाकुंभरी देवी मंदिर के विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान दे रही है। पूरे मंदिर परिसर की सजावट से लेकर वहां तक पहुंचने वाली सड़कों को चौड़ा करने का काम तेजी से चल रहा है, ताकि भक्तों को आने-जाने में कोई परेशानी न हो। यही नहीं, अब इस पवित्र धाम तक सीधे रेलवे लाइन पहुंचाने की भी बात चल रही है, जिससे देश के कोने-कोने से लोग आसानी से यहां आ सकेंगे। इन सब सुविधाओं और बेहतर रास्तों को देखकर अब पहले की तुलना में बहुत अधिक संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा है।

Maa Shakumbhari Devi

Conclusion: माता की महिमा अपार है

मां शाकुंभरी देवी का इतिहास बताता है कि कैसे राजस्थान का सांभर मंदिर और सहारनपुर का बेहट मंदिर एक ही ज्योत से जुड़े हैं। चौहान वंश की कुलदेवी और जस्मौर रियासत के राजा की ये गाथा आज भी लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। अगर आप भी माता के भक्त हैं, तो इन दोनों दरबारों में हाजिरी जरूर लगाएं।

FAQ’s (आपके सवाल और जवाब):

  1. मां शाकुंभरी देवी किस वंश की कुलदेवी हैं?
    मां शाकुंभरी देवी मूल रूप से चौहान वंश की कुलदेवी हैं।
  2. सहारनपुर में शाकुंभरी देवी मंदिर की स्थापना किसने की थी?
    सहारनपुर के बेहट में पड़ने वाली जस्मौर रियासत के राजा ने राजस्थान से माता की ज्योत लाकर इस मंदिर की स्थापना की थी।
  3. माता के दर्शन से पहले किसके दर्शन जरूरी हैं?
    माता के दर्शन से पहले बाबा भूरादेव के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है।

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Randeep Rana

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