अयोध्या: 8 पर FIR तो चम्पत राय का नाम भी नहीं

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web डेस्क सहारनपुर / अयोध्या। राममंदिर जो लोगो की आस्था के केंद्र है वह करोड़ो का गबन हो गया श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य श्री कृष्ण मोहन ने तहरीर दी तो कार्यवाही में 8 लोगो का नाम आने से हड़कंप मच गया लेकिन लोगो के मन में एक सवाल है उसका जवाब ढूंढ़ने के लिए सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी है विपक्षी भी भाजपा का घेराव कर रहे है। लेकिन जो सबसे बडा सवाल वो ये की चम्पत राय का नाम इस रिपोर्ट में क्यों नहीं लिखवाया गया। आइये पूरी खबर की सच्चाई जानते है।

ये 8 लोग आये सवालो के घेरे में गिरी गाज

प्रारंभिक जांच के आधार पर पुलिस ने जिन 8 लोगों को मुख्य आरोपी बनाया है, उनमें टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्र, अविनाश शुक्ल और मनीष यादव शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन आरोपियों में से 6 सीधे तौर पर कैशियर की भूमिका में थे, जिनका काम श्रद्धालुओं के दान और चढ़ावे की गिनती करना था।

इन सभी के खिलाफ नए कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की बेहद गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। इसमें पेशेवर विश्वासघात से जुड़ी धारा 316(5) भी शामिल है, जिसमें दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान है। एसआईटी (SIT) ने इस मामले में अब तक 125 से ज्यादा लोगों से कड़ी पूछताछ की है, जिसके बाद यह पहली बड़ी गाज गिरी है।

आखिर चंपत राय का नाम एफआईआर से बाहर क्यों?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के नाम को लेकर खड़ा हो गया है। सूत्रों और एसआईटी की 12 पन्नों की प्रारंभिक गोपनीय रिपोर्ट के मुताबिक, चंपत राय का नाम इस एफआईआर में न होने के मुख्य तकनीकी और प्रशासनिक कारण निम्नलिखित हैं:

सीधी भौतिक संलिप्तता का न होना: एसआईटी की शुरुआती जांच का फोकस सीधे तौर पर उन कर्मचारियों पर है जो कैश काउंटर, लॉकर और नोटों की गिनती की प्रक्रिया (Physical handling) में शामिल थे। चंपत राय प्रशासनिक स्तर पर काम देखते हैं, इसलिए पैसे की सीधी हेराफेरी में प्राथमिक तौर पर उनका नाम सामने नहीं आया।

प्रशासनिक चूक बनाम आपराधिक संलिप्तता: कानूनी जानकारों का मानना है कि किसी बड़ी संस्था में निचले स्तर पर हुई चोरी के लिए सीधे शीर्ष अधिकारी को आपराधिक रूप से तब तक नामजद नहीं किया जा सकता, जब तक कि उनके खिलाफ पुख्ता डिजिटल या दस्तावेजी सबूत न मिलें।

नैतिक जिम्मेदारी और इस्तीफे की मांग: सुलग रही है सियासत

भले ही तकनीकी रूप से चंपत राय का नाम एफआईआर में नहीं है, लेकिन वे पूरी तरह से सवालों के घेरे से बाहर नहीं हैं। इस मामले ने अब एक बड़ा नैतिक और राजनीतिक रूप ले लिया है:

विपक्ष के तीखे हमले: विपक्षी दलों और कुछ स्थानीय संतों का सीधा आरोप है कि जब पूरा प्रबंधन चंपत राय की देखरेख में चल रहा था, तो इतने महीनों तक करोड़ों की हेराफेरी उनकी नाक के नीचे कैसे होती रही? क्या यह सिर्फ एक लापरवाही थी या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं?

इस्तीफे का बढ़ता दबाव: विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कुछ धड़ों और मंदिर से जुड़े पूर्व लेखाकारों की तरफ से यह मांग तेज हो गई है कि जांच को पूरी तरह निष्पक्ष बनाए रखने के लिए चंपत राय को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

PMO के सवाल पर चुप्पी: बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी ट्रस्ट की संपत्तियों और आय-व्यय का पूरा ब्योरा मांगा था। हालांकि, चंपत राय ने यह कहते हुए विस्तृत जानकारी देने से फिलहाल इनकार किया है कि मामला अभी एसआईटी की विस्तृत जांच के दायरे में है।

श्रद्धालुओं की आस्था को पहुंची ठेस

इस पूरे घटनाक्रम ने अयोध्या आने वाले आम श्रद्धालुओं को झकझोर कर रख दिया है। दूर-दराज के गांवों से आकर अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया रामलला के चरणों में सौंपने वाले भक्तों का कहना है कि भगवान के घर में ऐसा विश्वासघात अक्षम्य है।एसआईटी की विस्तृत जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में कुछ और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। अब देखना यह होगा कि क्या जांच की आंच ट्रस्ट के शीर्ष अधिकारियों तक पहुँचती है, या मामला सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर आकर सिमट जाता है।

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Randeep Rana

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